गुणों का प्रभाव पर मधुमाखी को प्यार और भौरे को तिरस्कार

 



वाराणसी नगरी के पास एक बहुत बड़ा तालाब था । वह सदा जल से लबालब भरा रहता था । उसमें बड़े सुन्दर-सुन्दर कमल खिला करते थे । मार्च का महीना था । सारा तालाब कमलों से भरा हुआ था । तालाब का पानी कमल के फूल और चौड़े पत्तों से पूरा ढक गया था । किनारे पर उगी घास भी सुन्दर लगती थी। तालाब के आस-पास कई वृक्ष भी थे। उन पर पक्षी चहचहाया करते थे । मनुष्य भी उसकी छाया में विश्राम करते थे । वायु कमल के पराग को दूर तक उड़ा देती थी, इससे फूलों की सुगन्ध चारों ओर फैल जाती थी । उस गन्ध से अनेकों मधु मक्खियाँ भी आकर्षित हो जाती थीं । उनके झुण्ड आकर कमलों से रस चूसते रहते थे ।



मानी नाम की एक मधुमक्खी वहाँ रोज आया करती थी। इसी प्रकार शीलू मीरा भी रोज आता था। दोनों एक-दूसरे को आते-जाते उठते-बैठते देखते थे। पारे पि दोनों में मित्रता हो गयी। वे घण्टों बैठे कमल का रस चूसते रहते आपस में बतियाते रहते। जैसे ही सूरज डूबता स फूल से उड़ जाता, क्योंकि उसका घर वहीं से कई मील दूर था। मधुमक्खी के साथ ऐसी कोई कठिनाई नहीं थी। तालाब के पास ही एक किसान की झोंपड़ी थी । उस झोपड़ी के पास एक आम का पेड़ या । उसी पर मानी ने अपना घर बना रखा था । किसान भी रानी को बड़ा प्यार करता था । एक बार शीलू भर के पंख में चोट लग गयी। मानी बोली- शीलू भाई! तुम्हारा पर तो दूर है। तुम्हारे पंख में चोट लगी है । तुम घर कैसे जाओगे ? आज मेरे ही साथ चले चलो।

शीलू को मानी की यह बात अच्छी लगी । वह धीरे-धीरे उड़ता हुआ मानी के साथ चला। मानी का घर वृक्ष की ऊँची डाल पर था । शीलू वहाँ तक उड़ नहीं सकता था । मानी बोली- 'तुम यहाँ पेड़ के नीचे बैठो। मैं तुम्हारे लिये मीठा शहद लेकर आती हैं।' यह कहकर मानी घर्रर से अपने घर चली गयी । भौरा पेड़ के तले बैठने लगा । वहीं किसान अपने छोटे से बेटे के साथ बैठा था । भौर का संतुलन बिगड़ गया और वह किसान के बेटे से जा टकराया । शीलू का डंक उसके गाल से छू गया और वहाँ खून झलकने लगा। किसान ने हाथ का रूमाल उस पर मारते हुए कहा- 'यह न जाने कहाँ से मरने को आ क्या है ?"


भौरा जल्दी-जल्दी जान बचाकर भूखा-प्यासा भागा । उसे बड़ा दुःख हुआ कि वह जहाँ जाता है, सभी उससे भागते है बचते हैं। कोई मनुष्य उसे प्यार से नहीं देखता, बातें नहीं करता । भीरा निराश होकर तालाब के पास ही एक वृक्ष पर सो गया । दूसरे दिन मानी मक्खी उसे खोजते खोजते वहाँ आई । आते ही बोली-'वाह महाशय आप भी खूब है। कल हम आपके लिये खाना लेकर आये, खूब ढूँढ़ते रहे और आप नदारद थे ।' शीलू भरे ने दुःखी मन से कल की सारी घटना कह सुनाई । फिर बोला-'मानी बहिन ! एक बात पूछें, बुरा तो नहीं मानोगी?' "नहीं-नहीं बताओ क्या पूछ रहे थे ?' मानी ने कहा । !



मुझमें और तुममें बहुत समानता है । मैं काला हूँ, तुम भी काली हो, मेरे पंख हैं, तुम्हारे भी पंख है। मैं डंक मारता है, तुम भी डंक मारती हो । मैं फूलों का रस पीता हूँ, तुम भी पीती हो, पर क्या कारण है कि मैं जहाँ भी जाता है, लोग मुझे हट हट कहकर भगा देते हैं। तुम्हें तो वे घरों में भी पालते हैं । देखा जाय तो मैं सुन्दर हूँ, पर मेरा इतना अपमान क्यों होता है ? तुम एक तरह से कुरूप हो, फिर भी तुम्हें सब प्यार क्यों करते हैं ? तुम्हें ही क्यों पालते हैं ? भौंरा रोया रोया सा पूछ रहा था । मानी थोड़ी गम्भीर होते हुए कहने लगी- 'भाई ! तुम सुन्दर हो तो क्या हुआ? तुम्हारी सुन्दरता से किसी को क्या लाभ है? सुन्दरता तो क्षण भर के लिये आकर्षित करती है। वास्तविक और स्थाई आकर्षण तो गुणों का ही है । गुणी ही सम्मान के पात्र बनते हैं । मैं कुरूप हूँ तो क्या ?

 

मनुष्यों को कितना लाभ पहुँचाती है, यह भी कभी तुमने सोचा है ? " लिए शहद को बनाती है, वह उनके हजारी कामों में आता है। डंक मारती है तो क्या समाज के लाभ की बात ज्यादा सोचती । दूसरी का उपकार अधिक करती हूँ । मेरे बहुत से यह एक बुराई भी बैंक जाती है । सच बात तो यह है किसी भाई ही सौन्दर्य का स्थाई स्थान है । गुणी ही सच्चा प्यार पाता है । और सारी बात समझ गया था। वह भी सोच रहा था कि कैसे वह स्वर्ग की समाज के लिये उपयोगी बनाये ।


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