मसाला वाटिका से घरेलू उपचार
भोजन के समय दाल, शाक आदि में मिलाये जाने वाले मसालों में से अधिकांश ऐसे होते हैं, जिसमें किसी न किसी रोग के निवारण की क्षमता भी है। कई मसालों को एक साथ मिला देने पर उनसे रुचिकर स्वाद बनता है; पर औषधि की दृष्टि से उस सम्मिश्रण का प्रभाव गुणहीन हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह औषधि के स्थान पर प्रयोग करने योग्य भी नहीं रह जाते ।
मसालों को समान्यतया स्वादवर्धक एवं पाचक माना जाता । उनका आम प्रयोग-प्रचलन इसी रूप में है; पर उन्हें निरापद घरेलू चिकित्सा के रूप में भी प्रयुक्त किया जा सकता है ।
अच्छा हो अपने घर-आँगन में या जहाँ भी उपयुक्त जगह हो, एक-दो क्यारी मसालों, औषधियों को बो लिया जाए। वे हर ऋतु में बने रह सकते हैं। खाद-पानी, धूप- हवा का ध्यान रखा जाए, तो मसालों को हर मौसम में उपजाया जा सकता है। कुछ महीने सभी हरीतिमाओं के • लिए अनुकूल पड़ते हैं और कुछ सामान्य । यह स्थानीय भूमि एवं वातावरण पर भी बहुत कुछ निर्भर है। इसकी जानकारी पास-पड़ोस वालों अथवा सब्जी उगाने वालों से पूछ कर एकत्रित कर लेनी चाहिए । अधिक मात्रा में उगाने और अच्छी फसल लेने के लिए यह जानकारी विशेष काम आती है। अन्यथा साज-संभाल रखने पर मसालों के पौधे हर महीने बोये और काम में लाए जा सकते हैं ।
मसालों में हल्दी, सौंफ धनिया, अजवाइन, राई, अदरक (सॉठ) जैसी वस्तुएं भोजन में अतिरिक्त रूप से मिलाई जाती हैं। नमक, मिर्च तो नित्य ही प्रयुक्त होते हैं। इसीलिए उनका अतिरिक्त गुण देखने को नहीं मिलता । नशेबाज रोज तम्बाकू आदि पीते रहते हैं, फिर वह उनकी आदत में शुमार हो जाती है। छोटे बच्चों को मिर्च खिलाई जाय तो, वह रोने लगेगा । इसी प्रकार नमक की अधिक मात्रा भी असह्य होती है, किन्तु
एक बार उसका अभ्यास पड़ने पर कोई विशेष प्रतिकूल परिणाम तत्क नहीं होता। यहाँ 'अति' की चर्चा करना जरूरी है । 'अति' से जन्म लेने वाले कष्ट एवं रोग जब पथ्य की माँग करते हैं, तब मसालों की महत्ता मालूम पड़ती हैं। नमक या मिर्च का हृदयघात, अपच, पेप्टिक अल्सर, गुर्दे की बीमारियों में जब निषेध कर दिया जाता है, तब अनुभव होता है, कि वे किस प्रकार दैनन्दिनचर्या का एक अंग बन गये थे। अति से हर औषधि विष बन जाती है । मसाले भी अपवाद नहीं हैं। बाजार में पुराने घुन लगे, अशुद्ध सूखे मसाले लेने से अच्छा यही है कि उन्हें ताजा घर में ही उगा लिया जाय । अपवाद रूप में कुछ ही ऐसे हैं, जो ताजे प्राप्त नहीं किये जा सकते खनिज या अन्य स्रोतों से उपलब्ध होते हैं। घरेलू शाक-वाटिका जिस प्रकार आँगन में, छत पर, छप्पर पर गमलों, पेटियों और घड़ों के टूटे पेंदों में, टूटी टोकरियों या कनस्तरों में लगाकर खड़ी कर ली जाती है, उसी प्रकार मसाले बनाने के लिए भी घरों में या उनके आस-पास ही जगह तलाश की जा सकती है। जमीन का बड़ा टुकड़ा उपलब्ध हो, तो उन्हें अलग-अलग छोटे-छोटे टुकड़ों में बोया जा सकता है ।
हर मसाले में भी कितने ही विटामिन, खनिज तथा दूसरे उपयोगी रासायनिक तत्त्व होते हैं। इसलिए उनमें से जो रुचिकर हो, उनका चयन कर चटनी बनाई जा सकती है, उसे भोजन के साथ खाया जा सकता है। यह तो हुई रसोई को स्वादिष्ट या गुणकारी बनाने की विधा, पर समय-कुसमय, यदि कोई रोग-विकार उठ खड़ा हो तो उसकी प्राथमिक चिकित्सा हेतु इन मसालों में से जो उपयुक्त हों, उन्हें चुनकर प्रयोग में लाया जा सकता है। इस प्रकार एक ही कार्य से कई प्रयोजन सधते हैं । भोजन का स्वादिष्ट होना, उसमें कुपोषण निवारक गुणकारी तत्त्वों का समावेश होना, घर में सुगन्धित वातावरण रहने से चित्त प्रसन्न रहना और कृमि-कीटकों का सहज पलायन होते रहना। इन गुणों को देखते हुए इस निष्कर्ष पर सहज ही पहुँचा जा सकता है कि घरेलू शाकवाटिका आन्दोलन की तरह छोटी मसाला बाड़ियाँ भी घरों में उगाई
जानी चाहिए। साथ ही यह अनुभव भी होना चाहिये कि कौन मसाला वनस्पति किस रोग में काम आ सकती है और उसकी मात्रा कितनी होनी चाहिए । यों तो ये भारतीय परिवार संस्था पद्धति में घरेलू नुस्खों के रूप में चिर प्रचलित औषधियाँ हैं, फिर भी मात्रा एवं प्रयोग की शास्त्रोक्त-विज्ञान सम्मत जानकारी हर दृष्टि से उपयोगी है।
अनुमान के लिए जो मिश्रण परस्पर किया गया है, उसकी बात अलग है, पर चिकित्सा प्रयोजन में कई मसाले एक साथ न मिलना अधिक अच्छा है । एक ही वस्तु का प्रयोग करने से वह अपना पूरा गुण दिखा पाती है । मिश्रण करने से कई गुण एक साथ मिल जाने पर घपला हो जाता है । एक पदार्थ दूसरे पदार्थ के गुण बढ़ा भी सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि कोई तीसरा प्रभाव उत्पन्न हो जाय ।
लाल, पीला, नीला रंग न्यूनाधिक मात्रा में मिलने पर अनेक प्रकार के नये रंग बन जाते हैं। यही बात एलोपैथी की औषधियों पर भी लागू होती है। यही वनस्पतियों के बारे में भी है कि उन्हें मिला देने पर वे अपने मूलभूत गुणों से वंचित हो जायें और कोई अन्य प्रकार का ऐसा गुण उत्पन्न कर लें, जो इच्छित प्रयोजन पूरा न करके कुछ अन्य ही प्रकार का नया अवसर उत्पन्न कर दे ।
इसलिए चिकित्सा प्रयोजन में यह ध्यान रखा जाय कि एक बार में एक ही वनस्पति का प्रयोग हो । चटनी की बात दूसरी है। उसमें स्वादों की विविधता से उत्पन्न एक नये जायके का रसास्वादन करने की बात बनती है; पर चिकित्सा प्रयोजन में ऐसा करना उपयुक्त नहीं होगा।
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